नई दिल्ली। उम्र के हर पड़ाव में शरीर में होते हार्मोनल परिवर्तन, हर माह पीरियड की अनिवार्यता, घर और दफ़्तर के काम का दोहरा दबाव, सभी रिश्तों को निभाने की पूरी जिम्मेदारी और बढ़ते एकल परिवार की वजह से नारी मन और उदासी एक-दूसरे के पूरक होते हैं। इसका सीधा असर न केवल उनकी जिंदगी पर, बल्कि उनके परिवारिक रिश्तों, दांपत्य जीवन और गर्भ में पल रहे बच्चों तक पर पड़ता है। समय से पूर्व प्रसव और बांझपन तक की समस्याओं से जूझती महिलाओं पर हुए अस्पताल आधारित शोध बताते हैं कि हताश, निराशा और अवसाद के लिए उनका मन एक उर्वरक भूमि की तरह है।
महिलाओं में होता है युनि पोलर डिप्रेशन
वर्ल्ड ब्रेन सेंटर के निदेशक डॉ॰ निलेश तिवारी के अनुसार महिलाएं युनि पोलर डिप्रेशन की ज्यादा शिकार होती हैं। शोध में सामने आया है कि 22 से 30 प्रतिशत तक महिलाएं युनि पोलर डिप्रेशन की शिकार होती हैं। बढ़ता कामकाज का दबाव, अति महत्वकांक्षा, टूटते रिश्ते और बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा ने महिलाओं को अवसाद में ढकेल दिया है। युनि पोलर डिप्रेशन में महिलाएं उदासी में चली जाती है, जबकि बाईपोलर डिप्रेशन में हर चीज बढ़ जाती है। युनि पोलर दुख का अतिरेक है और बाईपोलर खुशी का अतिरेक। नारी के शरीर में हार्मोनल बदलाव और मस्तिष्क में न्यूरो केमिकल बदलाव की वजह से उदासी उनकी संगिनी बन जाती है। युनि पोलर डिप्रेशन के बढ़ने से महिलाएं ऑब्सेसिव कंप्लसिव डिसऑर्डर, साइकोसिस, स्कीजोफ्रेनिया आदि का शिकार हो जाती हैं। ये अलग-अलग मानसिक बीमारियां हैं, लेकिन इसमें कहीं न कहीं उदासी व हताशा मुख्य वजह होती है।
प्रसव लेकर आती है मानसिक परेशानियां
राममनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग विभाग के डॉ॰ नगेंद्र नारायण मिश्र के अनुसार, गर्भकाल और प्रसवोपरांत बड़ी संख्या में महिलाएं डिप्रेशन का शिकार हो जाती हैं। प्रसवोपरांत के अवसाद को पोस्ट पार्टम डिप्रेशन कहते हैं। टूटते परिवार, पति-पत्नी में कलह, साह-बहु के बिगड़ते रिश्ते आदि इसकी वजह हो सकते हैं। महिलाएं इसमें खुद को सभी से अलग-थलग कर लेती हैं और उदास रहने लगती हैं। वैसे तो उदासी का यह स्तर अस्थाई ही होता है, लेकिन जब यह बढ़ने लगे तो मानसिक समस्या का रूप ले लेता है।
उदासी व हताशा के स्थाई होने पर महिलाएं विक्षिप्त (न्यूरोसिस) और मनोविक्षिप्त (साइकोसिस) तक का शिकार हो जाती है। इसमें चीखना-चिल्लाना, चिड़चिड़ाना होना, असुरक्षित महसूस करना, दुश्चिंता, अनिद्रा जैसी समस्याएं पैदा होने लगती हैं। गर्भकाल में भी यह समस्याएं पैदा हो सकती हैं। गर्भकाल के शुरुआती तीन और आखिरी के तीन महीनों में महिलाओं को विशेष प्यार, लगाव, इलाज और समर्थन की जरूरत होती है।
दिल्ली का एक अध्ययन
कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के सुचेता कृपलानी अस्पताल में एक क्लिनिकल शोध हुआ था। इसमें यह सामने आया था कि गर्भकाल में 1 से 10 प्रतिशत तक और बच्चे के जन्म के उपरांत 50 से 70 फीसदी तक महिलाएं हताशा की शिकार होती हैं। थोड़े समय की हताशा बीमारी नहीं है, लेकिन जब यह हताशा लंबी उदासी में बदल जाती है तो यह अवसाद का रूप ले लेती है।
गर्भपात: अपराध भाव की गहरी पैठ
दिल्ली के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ॰ मनजीत सिंह भाटिया ने `मनोरोग गलत धारणाएं और सही पहलू' नामक अपनी किताब में लिखा है कि गर्भपात कराने वाली कई महिलाओं के मन में अपराध बोध बैठ जाता है, भावनात्मक अस्थिरता पैदा हो जाती है, सेक्स के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आ जाता है, हताशा घेर लेती है और आत्महत्या तक के विचार मन में आने लगते हैं। उनके अनुसार, आज महिलाएं गर्भपात को एक बच्चे की हत्या जैसा पाप नहीं समझतीं है, लेकिन इसके बावजूद 30 से 40 प्रतिशत बाद में अपराध भावना पालकर पश्चाताप ग्रस्त हो जाती हैं। इसके परिणाम स्वरूप मानसिक रूप से अस्थिर और चिड़चिड़ी हो जाती हैं।
मासिक धर्म: तन और मन की उलझन हर माह
डॉ॰ मनजीत सिंह भाटिया के अनुसार, महिलाओं की मानसिक परेशानियां बहुत हद तक हर महीने होने वाली माहवारी या पीरियड से जुड़ी होती है। मासिक धर्म से जुड़ी मानसिक समस्याएं मुख्यत: तीन रूपों में प्रकट होती हैं। पहला, किशोरावस्था में मासिक धर्म के शुरू होने पर, दूसरा अधेड़ावस्था में मासिक धर्म के बंद होने अर्थात रजोनिवृत्त होने पर और तीसरा हर महीने पीरियड शुरू होने से पहले होने वाले शारीरिक-मानसिक परिवर्तन के रूप में।
ये समस्याएं प्राय: मन व शरीर दोनों से ही संबंधित होती हैं। अध्ययन के अनुसार, पीरियड शुरू होने पर 40 फीसदी व रजोनिवृत्ति के समय 60 फीसदी महिलाएं शारीरिक-मानसिक समस्याओं से ग्रस्त होती हैं। इस कारण स्त्रियों को ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत आती है, अतिशय भावुकता घेर लेती है, कई तरह के शारीरिक दर्द का सामना करना पड़ता है, सेक्स के प्रति अनिच्छा का भाव पनप जाता है और कई तरह की शारीरिक परेशानियों का उन्हें सामना करना पड़ता है।
मन की उदासी से पीछा छुड़ाने का तरीका
* अपनी सोच व व्यवहार को सकारात्मक और नियंत्रित रखें
* अच्छे व स्वस्थ्य संबंध को विकसित करें
* पारिवारिक संबंध को मज़बूत बनाएं
* संयुक्त परिवार को प्रोत्साहित करें
* पति-पत्नी मिलकर समस्या का समाधान तलाशें
* सप्ताहांत में पति व बच्चों के साथ घूमने या शॉपिंग के लिए जाएं
* दांपत्य में सेक्स संबंध को उचित स्थान दें, उसके प्रति अनिच्छा न पालें
* ध्यान, योग व कसरत को जीवनचर्या बनाएं
* शराब व सिगरेट से दूर रहें