नई दिल्ली। सरकार अघोषित रूप से आपातकाल की ओर बढ रही है। हाल के वर्षों में अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरे सोशल साइटों पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने यह दर्शा दिया है कि उसके लिए लोकतंत्र का मतलब जनता से सिर्फ वोट हासिल करना है, न कि जनता को अपनी बात कहने का मौका देना।
मिश्र की क्रांति को लोगों ने फेसबुक क्रांति कहा था, लेकिन देख़ते ही देख़ते पूरी दुनिया इस सोशल नेटवर्क से उत्पन्न हुई क्रांति की चपेट में आ गई। रूस में पुतिन के खिलाफ तो एक ब्लॉगर ने ही आंदोलन की शुरुआत की थी। भारत में अण्णा हज़ारे के आंदोलन को facebook, twitter और SMS के जरिए जिस तरह से युवाओं का समर्थन मिला, उससे कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पूरी तरह से बौखला गई। केंद्रीय सूचना एवं प्रद्यौगिकी मंत्री कपिल सिब्बल को इस सभी पर प्रतिबंध लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। माननीय मंत्री ने पहले बल्क एसएमएस पर रोक लगाकर इसकी शुरुआत की और बाद में फेसबुक, गूगल, यू टयूब जैसे साइटों के प्रबंधकों को बुलाकर इस पर सेंसरशिप लागू करने का दबाव डाला। आम जनता को उसी वक्त पता चल गया कि यूपीए सरकार की मंशा आखिर क्या है? वह लोकतंत्र का दंभ तो भरती है, लेकिन लोकतंत्र में विरोध को दबाने की मंशा भी रख़ती है।
सोशल साइट संचालकों द्वारा सेंसरशिप से हाथ खडे करने के तुरंत बाद इन नेटवर्किंग साइटों के खिलाफ दिल्ली की अदालतों में मुकदमों की बारिश हो गई। शायद ही किसी को इसमें शक हो कि अदालत में मुकदमा दर्ज कराने वाले लोगों को सरकारी तंत्र से बढ़ावा दिया गया था। जल्दबाजी में हो रहे अदालती निर्णय से भी लोगों का यह शक पुख्ता हुआ कि सरकार और अदालत मिलकर सेंसरशिप की ओर बढ रहे हैं।
13 जनवरी 2011 को फेसबुक, गूगल सहित 21 वेबसाइटों के खिलाफ जिस तरह से केंद्र सरकार ने मुकदमा दर्ज़ करने की अनुमति दी, उससे साबित हो गया कि केंद्र सरकार की मंशा देश में अघोषित रूप से अपातकाल लगाने की है। मुख्यधारा की मीडिया तो बहुत हद तक सरकारी प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रही है, जिससे लोगों की उम्मीद पूरी तरह से टूट चुकी है। देश की आम जनता, खासकर युवा पीढी ने मुख्यधारा की मीडिया की विश्वसनीयता समाप्त होने के बाद ही सोशल साइटों की ओर रुख किया है, जिसे सरकार नहीं पचा पा रही है।
13 जनवरी की रात से ही कई लोगों के फेसबुक एकाउंट की आईडी को ब्लॉक करने का काम शुरू हो गया। सरकार की पहली प्राथमिकता उन लोगों के आईडी को ब्लॉक करने की थी, जो यूपीए सरकार, कांग्रेस और सोनिया-राहुल गांधी को लेकर मुख्यधारा की मीडिया द्वारा छुपाई गई जानकारी को शेयर कर रहे थे। सरकार ऐसे जुट गई जैसे सोनिया-राहुल को गोद में छुपाना चाहती हो।
उदाहरण के लिए रामेश्वर आर्या न केवल खुद फेसबुक पर मौजूद हैं, बल्कि फेसबुक पर वह 18 पेजों को संचालित कर रहे हैं। उनका हमला, कांग्रेस व यूपीए सरकार पर तो है ही, उन्होंने बकायदा एक पेज बना रखा था, जिसका नाम ` रियलिटी ऑफ कांग्रेस, गांधी-नेहरू परिवार' है। इस पेज के साथ उनके सभी 18 पेज 13 जनवरी की रात से बंद पडे हैं। रामेश्वर आर्य बताते हैं कि उनके friend लिस्ट में 5000 व्यक्ति हैं। 3000 लोगों ने उन्हें सब्सक्राइव कर रखा है। इसके अलावा उनके 18 पेजों पर 10 हज़ार से अधिक समर्थक हैं। शुक्रवार रात से मैं अपना फेसबुक खोल ही नहीं पा रहा हूं। मेरे आईडी को ब्लॉक कर दिया गया है। बिना आईडी के इन पेजों का संचालन भी नहीं किया जा सकता है।
जब मैंने खुद उनके पेज को खोलने की कोशिश की तो पेज खुलने की जगह एरर दिखाना शुरू हो गया। रामेश्वर आर्य का आरोप है कि सरकार ने जनता की आवाज दबाने की कोशिश की है। मेरे कई और जानकारों के आईडी को भी ब्लॉक किया गया है। सरकार धीरे-धीरे अपातकाल की ओर बढ रही है।
ऐसे ही एक व्यक्ति हैं भगत सिंह क्रांति सेना के तजिंदर पाल सिंह बग्गा। तजिंदर पाल सिंह बग्गा वही हैं, जिन्होंने टीम अण्णा के सदस्य प्रशांत भूषण को कश्मीर पर देश विरोधी बयान के मद्देनजर चेंबर में घुसकर मारा था और उसके बाद वह तीन दिन जेल में रहकर भी आए हैं। तेजेंद्र का आईडी भी 13 जनवरी की रात से ब्लॉक है। तेजेंद्र का कहना है कि सरकार लोगों के समर्थकों की कडि़यों को तोडने की मंशा से काम कर रही है। मेरे पांच हज़ार समर्थक थे, लेकिन अब कोई और आइडी से फेसबुक एकाउंट खोलूंगा तो फिर से friends बनाने में बहुत समय लगेगा। इस देश में या तो आपातकाल लगाने की तैयारी है या फिर इस देश में विद्रोह की आग भड़केगी। यह सब सरकार कांग्रेस और गांधी परिवार की सच्चाई को छुपाने की नीयत से कर रही है।
काला धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में आंदोलन कर रहे योग गुरू स्वामी रामदेव का कहना है कि सोशल साइटों पर प्रतिबंध जनता, लोकतंत्र व आजादी का गला घोंटने के समान है। यदि लोग रामदेव को इन पर गाली दें तो ठीक, लेकिन जब बात अपने ऊपर आती है तो यह सरकार प्रतिबंध लगाने की बात करती है। अश्लीलता तो एक बहाना है। घरों में टीवी व सिनेमा भी अश्लीलता परोस रहे हैं, लेकिन सरकार वहां तो प्रतिबंध नहीं लगाती? युवा से उनके सशक्त अभिव्यक्ति के माध्यम को छीन कर सरकार आत्मघाती कदम उठा रही है।
Sandeep deo