लाइबेरिया की राष्ट्रपति एलेन जोहान्सन सरलीफ, लाइबेरिया में शांति के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता लिमेह जिबोई और यमन की तवाक्कुल कारमैन को महिला अधिकारों पर उनके काम के लिए वर्ष 2011 के नोबल शांति पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई।
नार्वे की नोबेल समिति ने इन तीन महिलाओं को ‘महिलाओं की सुरक्षा और शांति संबंधी काम में पूर्ण भागीदारी के लिए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना हैा तीनों विजेताओं में 10 मिलियन क्रोनर (डेढ़ मिलियन यूएस डॉलर) की पुरस्कार राशि बराबर-बराबर बांटी जाएगी।
अफ्रीका की पहली महिला राष्ट्रपति सरलीफ
72 वर्षीय सरलीफ जोहान्सन अफ्रीका में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई पहली महिला राष्ट्रपति हैं। वह हावर्ड में शिक्षित अर्थशास्त्री हैं, जो वर्ष 2005 में अफ्रीका की पहली लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई राष्ट्रपति बनी थी।
जब जोहान्सन ने पदभार संभाला तो उन्हें लाइबेरिया में सुधारक और शांति स्थापित करने वाली नेता के रूप में देखा गया, लेकिन हाल में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उनके विरोधियों ने उन पर वोटों को खरीदने और प्रचार के लिए सरकारी धन का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था। जोहान्सन के समर्थकों ने इन आरोपों का खंडन किया था।
लाइबेरिया बहुत लंबे समय तक गृहयुद्ध से पीड़ित रहा, जो वर्ष 2003 तक जारी रहा। यह देश संयुक्त राष्ट्र शांतिरक्षकों के साथ मिलकर अभी भी शांति बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। पुरस्कार मिलने की घोषणा के बाद सरलीफ ने कहा कि इस पुरस्कार ने मुझे मेलमिलाप के लिए काम करने की नई प्रेरणा दी है।
लाइबेरिया की ही लिमेह जिबोई
लाइबेरिया में ही शांति के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता लेयमाह बोवी ने ईसाई और मुस्लिम महिलाओं के एक समूह का गठन किया था ताकि लाइबेरिया के सरदारों को चुनौती दी जा सके। 39 साल की जीबोई ने लाइबेरिया में गृहयुद्ध समाप्त करने के लिए इसके खिलाफ महिलाओं को लामबंद किया। उन्होंने महिला उत्पीड़न के खिलाफ मुहिम भी छेड़ी। जिबोई को पुरस्कार मिलने के बाद उसकी सहयोगी बेर्था अमानोर ने कहा कि लीमेह जीबोई में अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने का साहस है।
तवाकुल ने उठाई निरंकुशता के खिलाफ आवाज
अरब जगत में लोकतंत्र की बहाली के संघर्ष से पूर्व और बाद की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में 32 वर्षीय तवाकुल करमैन ने महिला अधिकारों और यमन में शांति की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। तवाकुल ने अपने देश में निरंकुश सत्ता के खिलाफ खड़े होने का साहस दिखाया।
तवाक्कुल कारमैन (32) तीन बच्चों की मां हैं। उन्होंने महिला पत्रकारों के एक समूह का नेतृत्व किया। वह यमन में विरोध प्रदर्शन आयोजित करने वाले प्रमुख लोगों में शामिल थी।
उन्होंने यमन के राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह के शासन का विरोध किया। कारमैन के पिता सालेह के मंत्रिमंडल में कानूनी मामलों के मंत्री रह चुके हैं। वे एक पत्रकार हैं ओर इस्लाह पार्टी की एक सदस्य हैं। तवाकुल इसलामिक संगठन मुसलिम ब्रदरहुड से संबंधित आंदोलन से जुड़ी हुई हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की सूचना मिलने पर तवाकुल करमैन ने कहा कि यह यमन में प्रदर्शनकारियों की जीत है। जब तक सभी अधिकार जीत नहीं लिए जाएंगे, लोकतंत्र और आधुनिक यमन के लिए संघर्ष जारी रहेगा।
नोबेल पुरस्कार समिति ने कहा कि हम विश्व में लोकतंत्र और स्थायी शांति के लक्ष्य को तब तक हासिल नहीं कर सकते हैं, जब तक पुरुषों की तरह महिलाओं को समाज के प्रत्येक स्तर पर विकास को प्रभावित करने के लिए समान अवसर नहीं मिल जाते।
साभार: एजेंसियां
nobel peace prize-2011