कहने को आधुनिक, लेकिन बेटी के पैदा होते ही उतर जाते हैं चेहरे

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नई दिल्ली। दिल्ली देश की राजधानी और और दुनिया के आधुनिकतम शहरों में शुमार है, लेकिन यहां भी लडकियों के पैदा होने पर मां-बाप के चेहरे लटक जाते हैं। परिजन का ध्यान बच्चे को जन्म देने वाली मां पर कम, पैदा होने वाले बच्चे के 'लिंग' पर ज्यादा होता है।

प्रसूति कक्ष से डॉक्टर के बाहर निकलते ही प्रसूता के परिजन का पहला सवाल होता है, डॉक्टर साहब क्या हुआ? यदि डॉक्टर ने `बेटा` कहा तो मिठाईयां बंटनी शुरू हो जाती है और यदि `बेटी` कहा तो हल्की मुस्कुराहट में लिपटी गमगीन आंखें बहुत कुछ कह जाती हैं। यह दिल्ली सहित हरियाणा व पंजाब के डॉक्टरों का अवलोकन है, जो दर्शाता है कि गांव और महानगर के बीच की दूरियां 'लिंग भेद` को लेकर कब की मिट चुकी है।

डॉक्टरों के एक पोर्टल डॉक्टर्स पब्लिक डॉट कॉम ने दिल्ली, पंजाब व हरियाणा में एक सर्वेक्षण कराया। इस सर्वेक्षण में 679 शिशु रोग विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। सर्वे में शामिल डॉक्टरों के मुताबिक इन तीन राज्यों में बच्चे के जन्म और उसके बाद लालन-पालन में भी जबरदस्त लैंगिक भेदभाव देखने को मिलता है। लिंग असमानता (girl child discrimination) की दर में कहीं कोई कमी नहीं आई है।

बेटी की पैदाइश पर मिठाई और बेटी पर गमगीन आंखें
सर्वे में शामिल डॉक्टरों में से 65 फीसदी ने कहा कि बेटे के जन्म की ख़बर मिलते ही बच्चे का पिता व उसके परिजन खुशियां मनाने में जुट जाते हैं। नर्सों में ईनाम भी बांटा जाता है और लोगों का मुंह भी जमकर मीठा कराया जाता है। वहीं केवल 27 फीसदी का कहना था कि बेटा-बेटी दोनों के जन्म के समय समान रूप से खुशियां मनाते उन्होंने देखा। सबसे अधिक ताज्जुब यह जानकर हुआ कि केवल 2 फीसदी डॉक्टरों ने ही अब तक के अपने प्रैक्टिस में बेटियों के जन्म के समय अभिभावकों को खुशियां मनाते देखा है।

स्‍तनपान को लेकर भी भेदभाव
जन्म के समय शुरू हुआ यह भेदभाव स्तनपान के समय थोडा कम होता देखा गया। सर्वे में शामिल बाल रोग विशेषज्ञों ने कहा कि स्तनपान के 26 फीसदी मामलों में उन्होंने मां का झुकाव बेटे की ओर पाया तो 22 फीसदी मामले में मां का झुकाव बेटी की ओर था। 48 फीसदी का कहना था कि स्तनपान को लेकर उन्होंने मां का झुकाव बेटा-बेटी की ओर एक समान पाया।

बेटी के टीकाकरण में भी असमानता
टीकाकरण के मामले में 63 फीसदी डॉक्टरों ने अभिभावकों द्वारा बेटा-बेटी को समान महत्व देने की बात कही तो 33 फीसदी ने कहा कि बेटे के टीकारण के प्रति मां-बाप अधिक जागरूक थे। वहीं बेटी के टीकाकरण को लेकर अधिक सजग रहने का मामला केवल चार फीसदी डॉक्टरों ने स्वीकारा।

बड़ा होने के साथ बढ़ता गया भेदभाव
बच्चों के बडा होने के साथ यह भेदभाव बढता चला जाता है। 48 फीसदी डॉक्टरों ने अपने क्लिनिकल अवलोकन में बेटे की अपेक्षा बेटी को कम वजन का पाया, वहीं केवल नौ फीसदी डॉक्टरों को ही कुपोषित बेटा दिखा। 54 फीसदी डॉक्टरों ने कहा कि ज्यादातर बेटे में आयु के अनुसार उचित वजन देखा जाता है।

डॉक्टर्स पब्लिक डॉट कॉम के मुख्य संचालक अधिकारी डॉ हर्षित जैन ने कहा कि इस सर्वेक्षण से शिशु रोग विशेषज्ञों द्वारा शिशुओं के जन्म से लेकर उनके आहार तक बरते जा रहे लैंगिक भेदभाव का पता चलता है। इससे स्पष्ट है कि लैंगिक समानता अभी भी दूर की कौडी है।


Girl child discrimination