महंगाई से खफा जनता ने दी अन्ना को ताकत

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अंशुमान तिवारी, नई दिल्ली। अन्ना के आंदोलन में विदेशी हाथ का अजीबोगरीब कांग्रेसी आरोप तो पुष्ट नहीं हुआ, लेकिन महंगाई पर जनता के गुस्से का हाथ इस आंदोलन में जरूर है। 64 साल में अधिकांश अहम राजनीतिक करवटों की बुनियाद जनता को निचोड़ने वाली महंगाई ने ही तैयार की है। 1967 में कांग्रेस को लगे पहले चुनावी झटके से लेकर ताजा आंदोलन तक महंगाई हर प्रमुख परिवर्तन की अदृश्य नायक रही है।


मिस्त्र, यमन, ट्यूनीशिया की ताजा क्रांतियों व चीन के आंदोलनों को भी पहली चिंगारी महंगाई से ही मिली थी। सरकार और कांग्रेस ने देश के अतीत और अंतरराष्ट्रीय वर्तमान दोनों से ही कोई सबक नहीं लिया। महंगाई देश की आर्थिक ही नहीं राजनीतिक नसीहतों का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय है। अन्ना के पीछे खड़ी जनता पिछले दो साल से महंगाई से भी त्रस्त हैं। यही गुस्सा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के सहारे फट पड़ा।

प्रधानमंत्री जब महंगाई दूर करने के लिए जादू की छड़ी न होने का तर्क देते हैं या वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी महंगाई को मजबूरी बताते हैं, तो उसके गहरे राजनीतिक असर होते हैं। कांग्रेस के अधिकृत इतिहासकार प्रणब मुखर्जी से बेहतर यह कौन जानता होगा कि कांग्रेस को महंगाई ने कितना सताया है। महंगाई के दीर्घकालीन आंकड़ों की रोशनी में देश का राजनीतिक इतिहास इसका गवाह है। 1967, 1974-75, 1991, 1996 से 1999 के वर्ष राजनीतिक उथल-पुथल या बड़े परिवर्तनों के वर्ष रहे हैं। इनकी पृष्ठभूमि में भारी महंगाई थी।


तीसरी लोकसभा तक चुनावी सफलता के शिखर पर रही कांग्रेस को 1967 में पहला बड़ा झटका लगा था। कांग्रेस कई राज्यों में हारी और चौथी लोकसभा में उसकी ताकत घट गई। यह मुसीबत 1965-66 में अनाज के संकट और 10 से 12 फीसदी की मुद्रास्फीति ने तैयार की थी। नेहरू के निधन के बाद का यह दौर कांग्रेस में गुटबाजी (सिंडिकेटों के उदय), पाकिस्तान से संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता के लिए जाना जाता है। 1971 में प्रचंड बहुमत के साथ उभरी इंदिरा गांधी के लिए 1974 की महंगाई प्रचंड मुश्किल बन गई। 1973 के अरब-इजरायल संकट के बाद महंगे हुए पेट्रोल-डीजल के चलते वह चरम महंगाई का दौर था। उस समय खाने के लिए दंगे भी हुए और महंगाई की बुनियाद पर उठे आंदोलनों ने सरकार को हिला दिया। 1975 का आपातकाल इस घटना बहुल दौर का चरम था, जो 1977 में कांग्रेस की पराजय पर जाकर रुका।

आर्थिक सुधारों (1991) से पहले जो संकट उपजा था, उसमें भी महंगाई नायक थी। खाड़ी युद्ध (90-91) के कारण बढ़ी पेट्रो कीमतों ने महंगाई को 12 फीसदी तक उछाल दिया। भारी घाटा, भुगतान संकट, दिवालियेपन के बीच आर्थिक सुधार शुरू हुए। मगर महंगाई को दहाई से नीचे आने में डेढ़ साल लग गए। 1996 का चुनाव कांग्रेस के लिए हार लेकर आया। 1996 से 99 के बीच गठजोड़ सरकारों और राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भी महंगाई दहाई के अंक से ऊपर थी। ताजा आंदोलन भी अभूतपूर्व महंगाई की बुनियाद पर उगा है। आगे कुछ चुनाव भी खड़े हैं। क्या इतिहास खुद का दोहराएगा।


साभार: दैनिक जागरण
लेखक दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय ब्‍यूरो प्रमुख हैं