नई दिल्ली। पति से अलग रह रही महिला न तो ससुराल में रहने का दावा कर सकती है और न ही संपत्ति का दावा ही कर सकती है। सास-बहू के बीच कडवाहट भरे संबंद्ध को देख़ते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने यह व्यवस्था दी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सास के नाम घर हो और बहू अपने पति से अलग रह रही हो तो वह सास के घर में रहने का दावा नहीं कर सकती। न्यायालय ने यह आदेश मीरा (परिविर्तत नाम) की याचिका पर दिया है। महिला ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें महिला को विकासपुरी स्थित सास का घर खाली करने का आदेश दिया गया था। पुलिस में शिकायत करने और लीगल नोटिस देने के बाद भी बहू द्वारा घर से निकलने से इनकार करने पर 78 वर्षीय सास ने निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
78 वर्षीय बुजुर्ग महिला के वकील प्रभजीत जौहर ने न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेहता के समक्ष कहा कि मीरा आए दिन अपनी सास को प्रताडि़त करती थी। उसने सास का जीना मुहाल कर रखा है। वकील ने बताया कि लीगल नोटिस मिलने के बाद बेटे ने घर खाली कर दिया, लेकिन बहू ने घर से बाहर निकलने से इनकार कर दिया। बहू का तर्क था कि हिंदू दत्तक एवं भरणपोषण अधिनियम, 1956 (hindu adoption and maintenance act 1956) के तहत उस संपत्ति पर उसका भी हक है। लेकिन न्यायालय ने उसकी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि अगर संपत्ति सास के नाम पर हो और बेटा अपनी पत्नी से अलग रह रहा हो तो ऐसे में बहू उस घर को ससुराल (घर) नहीं बता सकती।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि 78 वर्षीय इस बुजुर्ग महिला समेत देश के हर नागरिक को शांति से जीने का अधिकार है और वह शांति से जीना चाहता है। ऐसे में अगली पीढी के लोगों को बडे बुजुर्गो को प्रताडि़त नहीं करना चाहिए। इस मामले में ऐसा लगता है कि बहू की प्रताडना से तंग आकर बुजुर्ग महिला को अदालत का रुख करना पडा है। न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेहता ने कहा कि मेरे विचार से बुजुर्ग महिला पर बहू को अपने घर में रखने के लिए दबाव नहीं डाला जा सकता। हां, यह जरूर है कि अगर बेटा उस घर में रहता तो बहू भी वहां रहने की हकदार होती।
साभार: राजीव सिन्हा, नईदुनिया
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