फिल्म निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता समेत कई भूमिकाओं में खुद को स्थापित कर चुके महेश भट्ट का कहना है कि इन सब भूमिकाओं से इतर भी उनका एक रूप है। वह कहते हैं, 'मैं समाज की परिभाषाओं को आंख मूंद कर स्वीकार नहीं करता।' शायद यही वजह है कि उनकी हर टिप्पणी एक न्यूज बन जाती है। लोग उनसे इत्तेफाक रख सकते हैं या उनकी आलोचना कर सकते हैं, लेकिन उन्हें अस्वीकार नहीं कर सकते।
मुझे नाजायज औलाद कहा गया
20 सितंबर 1949 को मुंबई में जन्मे भट्ट कहते हैं समाज में कुछ परिभाषाओं को शाश्वत मान लिया गया है और जो इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, उसे नाजायज कह दिया जाता है। मेरे पिता एक ब्राह्मण थे और मां मुस्लिम। दोनों समाज की, परिवार की परिभाषा के तहत फिट नहीं बैठे, इसलिए मुझे एक नाजायज औलाद भी कहा गया। जायज और नाजायज की इसी कश्मकश ने उन्हें इन परिभाषाओं से इतर सोचने का हौंसला दिया और उन्होंने समाज के बंधे हुए दायरे से बाहर निकल कर सोचना शुरू किया।
जो भोगा उसी को पर्दे पर उतारा
अर्थ, सारांश, डैडी, जनम और जख्म जैसी फिल्मों के जरिए समाज में मौजूद कई धारणाओं पर उन्होंने जबरदस्त प्रहार किया है। यही नहीं, वो लम्हे, जन्नत और मर्डर जैसी फिल्मों के जरिए वक्त के साथ बदल रहे समाज और रिश्तों को भी उन्होंने उतनी ही गहराई से पेश किया है। महेश कहते हैं, मैंने बदलते हुए वक्त की नब्ज को पहचान कर उसके साथ चलने की कोशिश की है, ताकि मैं पीछे न छूट जाऊं। इंसानी रिश्तों की जटिलताओं और समाज में मौजूद विरोधाभासों को हमेशा से अपनी फिल्मों के केंद्र में रखने वाले भट्ट का कहना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी के दौरान जो देखा, सीखा, समझा और भोगा उसी को आलोचना और परिणाम की परवाह किए बगैर पर्दे पर उतारा।
एक अच्छी पटकथा से मैं कभी दूर नहीं हुआ
उनका कहना है कि आज दर्शकों का अधिकांश हिस्सा गंभीर फिल्मों से ऊब महसूस करता है और सिर्फ मनोरंजन की तलाश में सिनेमाघरों तक जाता है। भट्ट कहते हैं भारतीय दर्शकों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उन्हें पर्दे पर सच्चाई तो चाहिए मगर साथ में हैप्पी एंडिंग का तड़का भी चाहिए। उन्होंने कहा, दर्शकों की इसी बदलती हुई मांग और बाजार में बने रहने के लिए मैं अपनी फिल्मों में यह बदलाव लाया, हालांकि जड़ें अभी भी उतनी ही मजबूत हैं और एक अच्छी पटकथा की जरूरत मेरी फिल्मों से कभी दूर नहीं हुई।
आज के सिनेमा में हिंदुस्तान खत्म हो रहा है
हिन्दुस्तानी सिनेमा के बदल रहे स्वरूप को स्वीकार करने वाले भट्ट को एक बात बहुत परेशान करती है वक्त के साथ बदलाव को स्वीकार करने तक तो ठीक है मगर आज के हिन्दुस्तानी सिनेमा में धीरे-धीरे हिन्दुस्तान ही खत्म होता जा रहा है। हालांकि उनका मानना है कि युवा पीढ़ी में शिद्दत, प्यास और ऊर्जा का जबर्दस्त प्रवाह है, बस गहराई की कमी होती जा रही है। महेश भट्ट ने अपने सिने करियर की शुरुआत वृत्तचित्र सकट से की और वर्ष 1982 में आई उनकी फिल्म अर्थ के जरिए उन्हें पहचान मिली।
साभार: एजेंसियां