संभोग काल में स्‍त्री लज्‍जा का रहस्‍य

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सीमोन द बोउवार। शारीरिक संबंध के दौरान स्‍त्री की लज्‍जा उसे परेशान रखती है। पहली बार तो स्‍त्री पुरुष की आंखों से आंखें नही मिलाना चाहती। ये भावनाएं गहराई से जमी रहती है। पुरुष और स्‍त्री अपने शरीर के नग्‍न प्रदर्शन में लज्‍जा का अनुभव करते हैं। शरीर को दूसरों की दृष्टि का केंद्र बनाने की भावना उद्विग्‍नता पैदा करती है,  पर यह सच्‍चाई है।

लज्‍जाशील युवती और आक्रमणकारी युवक
युवतियों में लज्‍जा अधिक होती है, युवकों में नहीं। युवकों की भूमिका इस कार्य में हमेशा आक्रमणकारी की होती है। उन्‍हें संकोच या भय नहीं कि किसी को उनकी निष्क्रियता दिखाई देगी। उनकी स्त्रियां उनसे सक्रियता की आशा करती हैं। उन्‍हें तो श्रेय तभी मिलता है जब वे अपनी काम शक्ति दिखा सकें, स्‍त्री को आनंद प्रदान कर सकें। वे सिद्ध करना चाहते हैं कि वे इस कला में विजय प्राप्‍त कर सकते हैं।

प्‍यार की तड़प, लेकिन पुरुष स्‍पर्श का विरोध
स्‍त्री अपनी इच्‍छा के अनुसार अपने शरीर को बदल नहीं सकती। चुंबन और प्‍यार के लिए मन ही मन तड़पने के बावजूद वह पुरुष के स्‍पर्श और पकड़ने का विरोध करती है। उनके नितंबों (बट्स) और कुचों(ब्रेस्‍ट) में काफी उभार और चर्बी रहती है। ये भाग उसमें लज्‍जा पैदा करते हैं। कई वय:प्राप्‍त महिलाएं भी जब कपड़े पहने रहती हैं, पसंद नहीं करतीं कि कोई उन्‍हें पीछे से देखे।

कोई भी कल्‍पना कर सकता है कि प्रेम क्षेत्र में प्रवेश करनेवाली नवदीक्षिता किस प्रकार प्रतिरोध कर विजय प्राप्‍त करके अपने को समर्पित कर देती है। वह पुरुष को अनुमति दे देती है कि वह उसे भर आंख देखे। वह दंभ से अपना प्रदर्शन करती है। वह सौंदर्य के आवरण से ढकी रहती है।

पुरुष पुष्‍ट करता है नारी शरीर के सौंदर्य का दंभ
स्‍त्री अपने शारीरिक सौंदर्य पर तब तक दंभ नहीं करती, जब तक पुरुष अउसके दंभ को पुष्‍ट नहीं करता। अब भी उसका प्रेमी ही निर्णायक होता है। हर रूप में वह उसे उसका सच्‍चा रूप दिखा देता है। यद्यपि स्‍त्री को आईने में अपनी परछाई देखकर हर्ष होता है, वह मुग्‍ध हो जाती है, फिर भी उसे भय रहता है। पुरुष के निर्णय के प्रति वह शंकित रहती है। वह रोशनी बंद कर देना और बिस्‍तर में छिप जाना चाहती है। जब वह पुरुष के सम्‍मुख होती है, उसकी आंखें उसे देख रही होती है तब वह धोखा नहीं दे सकती, संघर्ष नहीं कर सकती।

पुरुष संपर्क में ही काम का वास्‍तविक अनुभव
पुरुष के संपर्क में ही स्‍त्री को काम संबंधी वास्‍तविक अनुभव होते हैं। वह या तो बाल्‍यकाल और किशोरावस्‍था  की बातों को भूल जाती है या वे विचार बिल्‍कुल दृढ़ हो जाते हैं।

उत्‍तेजित होने के बावजूद बिस्‍तर पर क्‍यों निष्क्रिय रहती है औरत, पढें

अपने शरीर को लेकर किशोरियों में भय का संचार
किशोरियों के मन में तरह-तरह के भय रहते हैं। किसी को अपनी बड़ी एड़ी से भय लगता है, किसी को अपने वक्ष के अधिक उभार से। किसी की जांघें पतली होती है तो किसी की मछली-सी। यह सब न होने पर भी स्‍त्री के हृदय में शक बना रहता है। पता नहीं कौन-सी शारीरिक कमी दिख जाए।


नवयुवतियों के मन में एक अजीब भय रहता है कि वे शारीरिक रूप से अस्‍वाभाविक हैं। उदाहरणार्थ किसी को ऐसा लगता है कि नाभि ही वह स्‍थान है, जहां संभोग क्रिया की जाती है और चूंकि वह बंद है, इसलिए वह दुखी रहती है। किसी को लगता है कि वह उभयलिंगी है।

यदि किशोरियों में यह भय नहीं रहता तो वे सोचती हैं कि अब तक शरीर में जो अंग उपस्थित नहीं है वे हठात उपस्थित हो जाएंगे। क्‍या नया अंग ऊब व घृणा उत्‍पन्‍न करेगा। उदासीनता के भाव जाग्रत करेगा। क्‍या व्‍यंग्‍यात्‍मक शब्‍द कहे जाएंगे। उन्‍हें पुरुष के निर्णय को मानना हैा परीक्षा का समय आ गया है। इसलिए स्‍त्री के ऊपर प्रथम संभोग का बड़ा गहरा व दीर्घकालीन प्रभाव पड़ता है।

सीमोन द बोउवार की विश्‍व प्रसिद्ध कृति  THE SECOND SEX से साभार