रुपहले पर्दे से मुख्‍यमंत्री तक जयललिता का सफर

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तमिलनाडु की सत्ता में धमाकेदार वापसी करने वाली जयललिता जयरामन पिछले 30 वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं। 63 वर्षीय जयललिता तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं। राजनीति में आने से पहले जयललिता तमिल फिल्‍मों की हिरोइन थी। तमिल फिल्‍मों के सुपरस्‍टार और राजनीति में नया आयाम गढ़ने वाले एम जी रामचंद्रन ऊर्प एमजीआर जयललिता को राजनीति में लेकर आए और वह तब से वह उन्‍हीं की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।


एमजीआर व जयललिता की जोड़ी थी हिट
मैसूर में संध्या और जयरामन दंपति के घर जन्मीं जयललिता की शिक्षा चर्च पार्क कॉन्वेंट स्कूल में हुई। बहुत कम उम्र में ही वो तमिल फिल्मों में अभिनय करने लगी थीं और जल्दी ही मशहूर भी हो गई। उस ज़माने के सबसे लोकप्रिय अभिनेता एम जी रामचंद्रन के साथ उनकी जोड़ी बहुत ही मशहूर थी और दोनों ने कई हिट फिल्मों में एक साथ काम किया था। 1965 में "वेंन्निरा अदाई" फिल्म से अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू करने वाली जयललिता ने 300 से ज़्यादा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और हिंदी फिल्मों में काम किया है।

एमजीआर की बीबी पर भारी पड़ी जयललिता
1982 में एम जी रामचंद्रन उन्हें राजनीति में लेकर आए। एमजीआर ने जयललिता को राज्यसभा का सदस्य बनाने के साथ ही पार्टी का प्रचार सचिव भी नियुक्त किया। एमजीआर की मौत के बाद उनके राजनीतिक विरासत के लिए जयललिता और एमजीआर की पत्नी जानकी के बीच ज़बर्दस्त टकराव हुआ, जिसमें जयललिता का पलड़ा भारी रहा और 1991 में वो पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री चुनी गईं।


घमंड छोड़ अपनाने की रणनीति

अपने समर्थकों के बीच 'अम्‍मा' के नाम से मशहूर जयललिता को सत्ता में आने के बाद लगातार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ा। 1996 में वो चुनाव हार गईं। 2001 में वो एक बार फिर दोबारा तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं। इस बार उन्हें सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा और कुछ समय के लिए उन्हें मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। इस बीच राष्ट्रीय स्तर पर जयललिता भाजपा के क़रीब आईं और उन्होंने केंद्र में अटल बिहारी वाजपयी के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन किया।

2004 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें लगातार पराजय का सामना करना पड़ा। इस बीच कांग्रेस और डीएमके के बीच गठबंधन हो गया और इसी गठबंधन के हाथों 2006 के चुनाव में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

2009 के लोकसभा चुनाव में भी जब एआईएडीएमके को हार का मुंह देखना पड़ा तो अपने तानाशाही रवैय्ये के लिए मशहूर जयललिता को नर्म होना पड़ा और मौक़े की नज़ाकत को समझते हुए उन्होंने दूसरे छोटे दलों के साथ गठबंधन भी किया जिसमें अभिनेता विजयकांत की डीएमडीके भी शामिल थी।

अपने पिछले तौर तरीक़े को बदलते हुए उन्होंने वाम दलों के नेताओं के साथ मिलकर एक चुनावी रैली को भी संबोधित किया। पहले वो ऐसा करना अपनी शान के ख़िलाफ़ समझती थीं। जयललिता ने अपने बदलने का संकेत उस समय भी दिया जब पहले मुफ़्त चीज़ें देने का विरोध करने वाली इस नेता ने इन चुनावों में डीएमके के मुफ़्त चीज़ें देने का जवाब ऐसे ही वादे से दिया ताकि लोगों का ध्यान सरकार की असफलताओं और भ्रष्टाचार के मुद्दों से न हट सके।

जयललिता को आलोचना पसंद नहीं
जयललिता कितनी सख़्ती से सरकार चलाती हैं इसका एक उदाहरण इस बात से भी मिलता है कि 2001 में सत्ता में आने के बाद जब सरकारी कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी तो उन्होंने एक साथ दो लाख कर्मचारियों को ही बर्रख़ास्त कर हलचल मचा दी थी।
जयललिता को किसी की भी आलोचना पसंद नहीं आती और उनके समर्थक, कार्यकर्ता और पार्टी के बड़े-बड़े नेता भी उनके सामने नज़र और आवाज़ ऊंची नहीं कर पाते और उन के पैरों में गिर जाने को अपना सम्मान समझते हैं। जयललिता भी समर्थकों की ऐसी श्रद्धा से गदगद रहती हैं।

साभार: बीबीसी हिंदी/ एजेंसियां