वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा 28 फरवरी 2011 को पेश आम बजट ने महिलाओं को बेहद निराश किया है। उन्हें आयकर में किसी तरह की छूट नहीं मिली है। महिलाओं के लिए आयकर की सीमा पहले भी 1.90 लाख थी और अभी भी इतनी ही है। आयकर में छूट न देखकर कामकाजी महिलाएं तो हताश हुई ही हैं, पुरुषों के आयकर की सीमा में मामूली छूट से घरेलू महिलाओं को भी निराशा हाथ लगी है। उस पर से वित्त मंत्री ने अपने बजट में महिलाओं व मध्यवर्गीय परिवार के छोटे-छोटे शौक को कर दायरे में लाकर उनकी खुशियों को भी कुचलने का प्रयास किया है।
इस बजट में ब्रांटेड जुलरी व डायमंड पर टैक्स बढ़ा दिया गया है। यही नहीं, रेडिमेड कपड़े और एसी रेस्त्रां में खाना भी महंगा हो गया है। निजी अस्पताल में इलाज व कंप्यूटर भी महंगा हो गया है। रसोई गैस के दाम भी बढ़ने वाले हैं। सरकार ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेह 1500 रुपए से बढ़ाकर 3000 रुपए किया है, यह एक मात्र कदम है जो सरकार ने इस बजट में महिलाओं के एक वर्ग को राहत देने के लिए उठाया है।
महिलाओं को लिए घर चलाना, परिवार को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना और बचत करना पहले से ही मुश्किल साबित हो रहा था। रसोई का हर सामान जैसे आटा, दाल, चीनी, दूध, अंडा, फल पहले ही आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रहा है। ऐसे में सरकार से थोड़ी आयकर में छूट की उम्मीद थी, जो पूरी नहीं हुई । पेट्रोल पहले से महंगा है और रसोई गैस के दाम बढ़ने के आसार हैं। ऐसे में सरकार ने यदि पुरुषों को भी आयकर में 20 हजार रुपए की छूट दी है तो वह महंगाई के जरिए एक हाथ दे व दूसरे हाथ ले की राह पर चल रही है। पुरुषों के आयकर की सीमा को 1.60 से बढ़ाकर 1.80 लाख कर कर दिया गया है, जो बढ़ते महंगाई को देखकर कुछ भी नहीं है। उम्मीद थी कि इसे कम से कम दो लाख किया जाएगा ताकि कुछ राहत मिले, लेकिन वह भी नहीं मिला।
पुरुषों की बात यहां इसलिए की जा रही है कि ज्यादातर घरों की गृहस्थी उनके ही पैसे से चलती है। अभी भी महिलाओं का एक बड़ा तबका घर संभालता है। महिलाओं को तो आयकर में छूट नहीं मिली, उनके पतियों को भी केवल प्रति महीने 171 रुपए की ही छूट मिली है। यह बढ़ते महंगाई में ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। कामकाजी महिलाओं की हर वर्ष फरवरी-मार्च की सैलरी जब कट कर आता है तो उनका बजट बिगड़ता है। एक तरह से कहा जाए तो वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इस बजट में न तो कामकाजी महिलाओं का ध्यान रखा है और न ही घरेलू महिलाओं का।
ब्रांडेट जुलरी व रेस्तरां में खाने पर कर बढ़ाकर वित्त मंत्री ने मध्य वर्ग की छोटी-छोटी खुशियों पर भी प्रहार किया है। महंगाई की वजह से पिछले तीन-चार साल में वैसे ही बचत का स्तर शून्य पर पहुंच गया है, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तक मुश्किल हो गई है। यदि थोड़ी बहुत बचत हो भी जाती थी तो महिलाएं जुलरी, कपड़ों की शॉपिंग व सप्ताह या महीने के आखिर में खाना खाने के लिए बाहर जाकर थोड़ी खुशी व आजादी का अहसास करती थीं। वित्त मंत्री को शायद महिलाओं की यह खुशी भी रास नहीं आई । सरकार ने तो एक तरह से रसोई के बाद उनके शौक को ही कर दायरे में लाकर कुचल दिया है। कुल मिलाकर कहा जाए तो यह बजट किसी भी तरह से महिलाओं या यूं कहें कि मध्यवर्गीय पूरे परिवार को राहत देने का काम नहीं करती है।
श्वेता देव
कार्यकारी अधिकारी,
आधी आबादी डॉट कॉम