पुरुष सीढ़ी के बिना यहां तक पहुंचने वाली अकेली हैं ममता

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पश्चिम बंगाल में 34 साल से सत्ता में बने हुए वामपंथियों को उखाड़ फेंकने वाली ममता बनर्जी अभी तक की भारतीय राजनीति में एक मात्र महिला हैं, जो किसी पुरुष को सीढ़ी बनाए बिना इस मुकाम तक पहुंची हैं। कहने को इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी, मीरा कुमार, मायावती, उमा भारती, महबूबा मुफ़्ती, जयललिता, सुषमा स्‍वराज, शीला दीक्षित जैसी महिला राजनीतिज्ञों की एक लंबी फेरहिस्‍त है, जो भारतीय राजनीति की दशा व दिशा तय करती रही हैं, लेकिन इनमें ममता बनर्जी अकेली है, जिन्‍होंने सत्‍ता की यह डगर कठिन संघर्ष के बलबूते तय की है।

इंदिरा-सोनिया
शुरुआत आजाद भारत की राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली महिला व पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से करते हैं। इंदिरा गांधी जवाहर लाल नेहरू की विरासत को लेकर राजनीति में आई थी। कांग्रेस पार्टी को दो फाड़ करने के वक्‍त जवाहर लाल नेहरू की बेटी के रूप में उन्‍हें जनता की सहानुभूति प्राप्‍त हुई थी। इंदिरा की बहु सोनिया गांधी से यदि आप गांधी निकाल दें तो वह राजनीति के मैदान में डटी किसी महिला कार्यकर्ता जैसी राजनीति की समझ से भी कोसों दूर है। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की क्षत्रछाया में उन्‍होंने राजनीति का ककहरा पढ़ा। व्‍यक्ति व परिवारों को पूजने वाले इस देश में आज भी वह गांधी-नेहरू परिवार के नाम के सहारे ही आगे बढ़ रही हैं।

मायावती-जयललिता व अन्‍य
उत्‍तर प्रदेश की मुख्‍यमंत्री मायावती कांशी राम के राजनीतिक महत्‍वाकांक्षा की उपज हैं तो तमिलनाडु में सत्‍ता पर तीसरी बार काबिज होने वाली जयललिता एमजी रामचंद्रन की उत्‍तराधिकारी हैं। इसी तरह उमा भारती में गोविंदाचार्य ने राजनीति के गुण भरे। शीला दीक्षित अपने ससुर के विरासत को आगे बढ़ा रही है तो सुषमा स्‍वराज अटल बिहारी वाजपेयी व लालकृष्‍ण आडवाणी जैसों की छत्रछाया में आगे बढ़ी हैं। महबूबा मुफ्ती मोहम्‍मद सईद की बेटी हैं तो मीरा कुमार अपने पिता जगजीवन राम से प्रेरित और राजीव गांधी द्वारा राजनीति में लाई गई हैं। ये वो कुछ महिलाएं हैं जो राजनीति में अपना दबदबा रखती हैं जबकि ऐसे न जाने कितनी विधायक, सांसद और कार्यकता हैं जो किसी न किसी द्वारा सत्‍ता में लाई गई हैं।

ममता नहीं हैं ऐसी
ममता बनर्जी के साथ ऐसा नहीं है। उनके पीछे किसी भी ऐसे बड़े पुरुष राजनेता का नाम नहीं लिया जा सकता, जिन्‍होंने उन्‍हें आगे बढ़ाया हो। वह संघर्ष की तपन से उपजी हैं, और संघर्ष के बल पर ही भारतीय राजनीति में वामपंथी विरोध का एक मात्र चेहरा बन पाई हैं। राजनीतिक विश्लेषक रजत राय कहते हैं, "जब ममता 1985 में पहली बार लोक सभा पहुँची, तो वो न तो हिंदी बोल सकती थीं न अंग्रेज़ी. मैंने ख़ुद देखा है कि लोक सभा अध्यक्ष उनको बोलने की अनुमति देने के साथ ही मुँह छिपा कर हँसते थे. लेकिन आज जब ममता बोलती है तो उनके शत्रु तक ध्यान से सुनते हैं. वो देश में वामपंथ विरोधी आंदोलन का एक मात्र चेहरा हैं."

ममता का जीवन
ममता बनर्जी शुरू से ही बहुत ही सादा जीवन जीती रही हैं। वह आज भी एक छोटे से खांटी मध्यमवर्गीय इलाक़े में रहती हैं। मायावती की पहचान उनके महंगे बैग है तो जयललिता की पहचान उनके नए-नए सैंडल और पर्स हैं। ममता बनर्जी की पहचान उनके कपड़े का झोला, शरीर पर सस्‍ती साड़ी और पैर में नीली हवाई चप्‍पल है। वह साड़ी भी महज तीन-चार सौ रुपए की पहनती है और यह भी ध्‍यान नहीं देती कि उसमें इश्‍तरी पड़ी है या नहीं।

कभी दूध बेचकर चलाती थी घर
कभी ऐसा समय भी था जब ममता बनर्जी को गरीबी के चलते दूध बेचने का काम करना पड़ा था। उनके लिए अपने छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण में अपनी विधवा मां की मदद करने का यही अकेला तरीका था। ममता के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और जब वह बहुत छोटी थीं तभी उनकी मृत्यु हो गई थी। बाद में उन्होंने अपने परिवार को चलाने के लिए दूध बेचने काम किया। उन्होंने 70 के दशक में कांग्रेस की छात्र इकाई से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी।

सोमनाथ चटर्जी को हरा चुकी हैं ममता
ममता को 1984 से पहले पश्चिम बंगाल के बाहर कोई नहीं जानता था लेकिन जब उन्होंने इस साल के अपने पहले लोकसभा चुनाव में ही जादवपुर से माकपा नेता सोमनाथ चटर्जी को पराजित कर दिया तो वह देशभर में मशहूर हो गईं। इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कांग्रेस की अकर्मण्‍यता से नाराज हो बनाया तृणमूल कांग्रेस
वर्ष 1991 में वह प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के मंत्रिमंडल में शामिल हुईं लेकिन वह खेलों को विकसित करने के प्रति सरकार की उदासीनता देखकर नाखुश थीं। साल 1993 में वह मंत्रालय से बाहर हो गईं।

जब उन्हें एहसास हुआ कि कांग्रेस वास्तव में पश्चिम बंगाल से कम्युनिस्टों को उखाड़ना नहीं चाहती है तो उन्होंने 13 साल पहले तृणमूल कांग्रेस का गठन किया।

भाजपा का भी थामा दामन
वाम मोर्चे को पराजित करने की कोशिश में वह लगातार पाला बदलती रहीं। उन्होंने 1998 से 2001 तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का साथ दिया, साल 2001 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ खड़ी हुईं और फिर दोबारा 2001-06 तक भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन का साथ दिया।

कभी नहीं लगा भ्रष्‍टाचार का आरोप
ममता बनर्जी पर आज तक घोटाले का आरोप नहीं लगा जबकि वह केंद्र में कई बार मंत्री रह चुकी हैं जबकि जयललिता व मायावती पर भ्रष्‍टाचार के और सोनिया गांधी पर बोफोर्स तोप के दलाल क्‍वात्रोची को देश से बाहर निकालने, उसका सील बैंक खाता खुलवाने और स्विस बैंक में राहुल गांधी के नाम के एकाउंट को हैंडल करने के आरोप लग चुके हैं। ममता दो बार रेल मंत्री बनीं। सात बार सांसद और तीन बार केंद्रीय मंत्री बनने के बावजूद ममता साधारण ढंग से अपने कोलकाता के कालीघाट मंदिर के नजदीक स्थित एक मंजिला घर में रहती रहीं।

ममता के शौक
ममता राजनीति के अलावा चित्रकारी और लेखन में भी रुचि रखती हैं। वह एक अच्छी रसोईया भी हैं। वह धार्मिक भी हैं और हर साल काली पूजा में जरूर हिस्सा लेती हैं। कहने वाले कहते हैं कि ममता बनर्जी की राजनीति में नाटकीयता है, लेकिन झूठों के बीच जब वह सच बोलती है तो लोग उसे नाटक ही समझ लेते हैं।

Comments

ममता बनर्जी को बधाई

ममता बनर्जी को बहुत बहुत बधाई... उनके सीधे सादे और प्रेरक व्यक्तित्व से हम महिलाओ को बहुत कुछ सीखने की जरुरत है ... शुभकामनाए

मोनिका गुप्ता

www.monicagupta.info

binti

mamta didi aapse niwedan hai ki aapjo wada karti hai wo jarurpura karegi lekin thora dhire prnam a.k jha