पीएनडीटी एक्‍ट: 17 साल में म‍हज 55 को सजा

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देश के 27 राज्यों में लड़कियों का अनुपात लड़कों के मुकाबले पिछले दस सालों में घटा है, लेकिन लिंग चुनाव विरोधी पीसी-पीएनडीटी क़ानून के लागू होने के 17 साल बाद भी इस कानून के तहत सिर्फ 55 लोगों को सजा हुई है जबकि केवल 902 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई हैा

यह भ्रूण हत्‍या रोकने के प्रति केंद्र व राज्‍य सरकारों की उदासीनता दर्शाता हैा लिंग चयन के प्रति सरकारी उदासीनता का नमूना यह है कि अल्‍ट्रासाउंड मशीन लड़कियों के लिए नरसंहार का हथियार बनी हुई है और इस पर कोई रोक नहीं लग रहा हैा स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ पिछले 17 सालों में भारत में सिर्फ 801 अल्ट्रासाउंड मशीनें ग़ैरक़ानूनी इस्तेमाल के चलते ज़ब्त की गईं हैं।

2011 के जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक़ भारत में बच्चों का लिंगानुपात पिछले 50 सालों के सबसे निचले स्तर पर है। यानि देश में छह साल से कम उम्र के बच्चों में हर 1000 लड़कों के लिए 914 लड़कियां ही पैदा होती हैं। इसके पीछे एक मुख्य वजह शिशु के पैदा होने से पहले उसकी लिंग जांच और उसके आधार पर भ्रूण हत्या का प्रचलन है। इसकी रोकथाम के लिए 1994 में सरकार ने पीसीपीएनडीटी क़ानून (प्री-कनसेप्शन ऐन्ड प्री-नेटल डायग्नॉस्टिक टेकनीक्स ऐक्ट) पारित किया था, जिसे दृढ़ सरकारी इच्‍छाशक्ति के अभाव में ठीक ढंग से लागू नहीं किया जा सका हैा

 

पीसी-पीएनडीटी ऐक्ट 1994
ये क़ानून बच्चे का लिंग चुनने की मंशा से गर्भ में बच्चे की लिंग-जांच करने की तकनीक के इस्तेमाल को ग़ैरक़ानूनी क़रार देता है। क़ानून का उल्लंघन करने पर तीन साल की सज़ा और 10 हज़ार रुपए के जुर्माने का प्रावधान भी है। स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले 17 सालों में इस क़ानून के तहत सिर्फ 55 लोगों को सज़ा हुई है, जबकि 902 के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया। यानि महज़ छह फ़ीसदी मामलों में सज़ा.
पीएनडीटी क़ानून के तहत अल्ट्रासाउंड मशीनों के इस्तेमाल, ख़रीद-फ़रोख़्त इत्यादि के कड़े नियम बनाए गए हैं. लेकिन नई तकनीक आने की वजह से अब ये मशीनें छोटी हो गई हैं. इन्हें छुपाना और इस्‍तेमाल के लिए एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बहुत आसान है। साथ ही सरकारी इच्‍छाशक्ति और समाज में लड़कियों के प्रति बरता जाने वाला भेदभाव भ्रूण हत्‍या को लगातार बढ़ा रहा हैा