दिल्‍ली की सड़क पर हर तीसरे दिन पड़ी मिल जाती है लावारिस बच्चियां

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सतेंद्र त्रिपाठी, नई दिल्ली। देश की राजधानी में हर तीसरे दिन किसी न किसी सड़क पर या जगह पर एक बच्ची लावारिस हालत में मिल जाती है। इनमें नवजात से लेकर पांच साल की बच्चियों की संख्या ज्यादा है। ये कड़वी सच्चाई लड़कियों की सुरक्षा व उनके लालन-पालन को लेकर किए जा रहे सरकारी प्रयासों को मुंह चिढ़ा रही है। पिछले एक सप्‍ताह में ही इस तरह के चार मामले सामने आए हैं, जिसने राजधानी दिल्‍ली की आधुनिकता को चिंदी-चिंदी कर दिया है।


नवरात्र में कन्या को मां का दर्जा दिया जाता है, लेकिन उस मां को क्या जो अपनी बच्‍ची को कूड़ेदान और बाथरूम के नजदीक फेंक कर भाग गई। राजधानी के संजय गांधी  अस्तपाल में गत 25 और 27  सितंबर को दो नवजात बच्चियां कूड़ेदान और सीढ़ियों के नीचे मिली। अस्पताल ने अपने रिकोर्ड चेक किए, लेकिन बच्चियों के अभिभावक का कोई पता नहीं लगा। अस्पताल प्रशासन ने इसकी सूचना पुलिस को दे दी है। दोनों बच्चियां स्वस्थ है। एक बच्‍ची को एनजीओ के सुपुर्द कर दिया है जबकि एक बच्‍ची अभी अस्पताल में भर्ती है।

एक मामला, दिल्ली के भगवान महावीर अस्तपाल का है, जहां 11 जुलाई को एक महिला ने बच्‍ची को जन्म तो दिया लेकिन जैसे ही उसे पता लगा कि उसकी हालत ठीक नहीं है। उसे सांस लेने में दिक्‍कत हो रही थी। वह उसे छोड़ कर फरार हो गई। डॉक्टरों ने मेहनत कर बचा तो लिया, लेकिन उसे मां के दूध कि जरूरत है। बहुत छानबीन की गई, लेकिन मां का कहीं पता नहीं चला। उसने जो पता अस्पताल में लिखाया वह भी फर्जी निकला। पुलिस मां की तलाश कर रही है ताकि बच्‍ची को मां का दूध नसीब हो सके।

मां तेरी महानता के किस्से तो दुनिया भर में मशहूर है, लेकिन तूने मेरे साथ ऐसा क्यों किया..? मुझे जन्म देते ही फेंक  गई...यह तुने मुझे लड़की होने कि सजा दी है या  वजह कुछ और है...? यदि ये बच्चियां बोल पाती तो शायद यही सवाल उस मां से पूछती जो उसे संजय गांधी अस्पताल के कूड़ेदान में फेंक गई। मां को तो अपनी बच्चियां जान से ज्यादा प्यारी होती है, लेकिन बच्चियां अब उनके लिए बोझ क्‍यों बनती जा रही हैं। उसे जन्‍म लेते ही लड़की होने की सजा क्‍यों मिली। राजधानी दिल्‍ली के आंकड़े बताते हैं कि हर तीसरे दिन किसी न किसी अस्‍पताल के पास, कहीं कूड़ेदान में, सड़क किनारे नवजात बच्चियां पड़ी हुई मिल जाती है। इन बच्चियों को अनाथालय के हवाले कर दिया जाता है, क्‍योंकि लंबे समय तक इनके बारे में पूछताछ करने कोई नहीं आता।

लेखक वरिष्‍ठ अपराध संवाददाता हैं

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