पिताजी ने अमान (पूरा नाम अमानुद्दौला) भार्इ के लिए जलावन की लकडि़यों वाले कमरे से सारी लकडि़यां निकालकर उसमें कुर्सी-मेज और चौकी सजा दी। उन्हें शहर के कॉलेज में भर्ती करा देने के बाद पिताजी ने घर में सबको बता दिया कि अब से वे यहीं रहेंगे। उनका जो भी खर्च होगा, पिताजी ही वहन करेंगे।
'' अपने भी बाल-बच्चे हैं। इतना खर्च तुम कैसे उठाओगे? '' मां ने पिताजी की व्यवस्था को देखकर टोका।
पिताजी ने कहा, '' उठाना पड़ेगा। जब अपनी मां का जना भाई है। मैं अपने भाई को दुत्कार नहीं सकता। उसके रहने से तुम्हें भी लाभ होगा। बाजार से सौदा लाने का काम अब से वही किया करेगा ।''
'' यह काम तो अब नोमान, कमाल ही कर सकते हैं, बड़े हो गए हैं ।'' मां ने रूखे गले से कहा।
पिताजी अगले ही दिन मां के लिए छापे की एक सूती साड़ी खरीद लाए। मां ने कत्था लगाकर उस दिन एक पान खाया। उनके ओठ लाल हो गए थे। वे नई साड़ी पहनकर बिस्तर पर पिताजी से सटकर बैठती हुई बोलीं, ''यह साड़ी बहुत सुंदर है।'' मां इस साड़ी में कैसी लग रही थीं, इस बारे में कुछ न कहकर पिताजी ने व्याकुलता से पूछा, ''अमान को भोजन करा दिया है?''
दूसरे ही क्षण मां के सीने में जैसे कांटा चुभ गया। पिताजी का मां के प्रति यह प्रेम-दुलार क्या इस बात को लेकर था कि वे अमान का जरा ज्यादा ख्याल रखा करें?
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''जा अमानुद्दौला से एक माचिस मांग ला ।''' तईतई (घर की कामवाली) जिस दिन गई उसी दिन मां ने मुझे यह हुक्म दिया । मां को पता था कि चाचाजी के पास दियासलाई थी, मां ने उन्हें सिगरेट फूंकते हुए देखा था । मेरे चाचाजी उसी कमरे में रहते थे, जिसमें जलावन की लकडि़यां रहती थीं, जिसमें मजे की एक चीज दिखाने की बात कहकर शराफ मामा एक मनहूस शाम को मुझे ले गए थे ।
कमरे का दरवाजा ठेलकर भीतर घुसने पर देखा चाचाजी तख्त पर लेटे हुए थे । वे देखने में पिताजी की ही तरह थे- घुंघराले बाल, तीखी नाक, बड़ी-बड़ी आंखें, घनी काली भौंहें, गोर रंग । पिताजी को अगर ईंट के नीचे दबाकर थोड़ा चपटा कर दिया जाता और सिर की ओर दबाकर उन्हें नाटा कर दिया जाता तो वे अमान चाचा जैसे ही लगते । अब उस कमरे का पूरा नक्शा ही बदल गया था । अब वहां न लकडि़यां थीं, न चूहे थे । टीन की दीवार पर एक मढी हुई तस्वीर लटक रही थी, जिसमें लहरियेदार बाल संवारकर पैरों में पंपशू पहने चाचाजी खड़े थे। उस तस्वीर के दाहिनी ओर एक औरत की तस्वीर वाला कैलेंडर भी था । वहीं एक तरफ कंघी और शीशा भी रखा था । एक तरफ अलगनी पर उनके बिना तहाए कपड़े लटक रहे थे ।
''चाचाजी मां माचिस मांग रही हैं ।'' मैं कैलेंडर की तस्वीर देखती हुई बोली ।
''तुम्हारी मां माचिस लेकर क्या करेंगी?'' बिस्तर से उठकर अपने सीने के बालों में अंगुलियां फेरते हुए अमान चाचा ने पूछा ।
जवाब दिया, '' चूल्हा सुलगाएंगी । चावल पकाएंगी । ''
चाचाजी ने कहा, ''मगर मेरे पास माचिस नहीं है ।''
माचिस न होने की बात सुनकर मैं कमरे से बाहर जाने लगी ।
चाचाजी ने मुझे कमरे के अंदर खींच लिया। दांत दिखाकर हंसते हुए बोले, ''अरे जरा रुको, माचिस ले जाओ । माचिस है मेरे पास ।'' जादू दिखाने की तरह उन्होंने अचानक मेरे सामने माचिस की डिबिया लहराई । हाथ बढ़ाकर लेने को हुई तो उन्होंने अपना हाथ हटा लिया। दुबारा लेने को हुई तो उन्होंने फिर अपना हाथ हटा लिया । मेरी आंखों के सामने एक बार माचिस आती, एक बार नहीं आती । बिल्कुल जुगनू की तरह, एक बार चमकती थी दूसरे क्षण बुझ जाती थी।
मैं माचिस लेने के लिए चाचाजी के करीब गईा उन्होंने खींचकर मुझे और करीब कर लिया। और करीब जाने पर चाचाजी माचिस देने के बजाए मेरे पेट और बगलों को गुदगुदाते हुए मुझे बिस्तर पर चित लिटा दिया । मैं घोंघे की तरह सिमटकर पड़ी रही। मेरे घोंघेवत शरीर को चाचाजी ने हवा में उछाल दिया । जैसे कि चाचाजी गुल्ली-डंडा के डंडा थे और मैं गुल्ली थी। उनका हाथ मेरी देह पर से सरकता हुआ हाफ पैंट तक पहुंचा। वह मेरा हाफ पैंट नीचे की ओर सरकाने लगे।
मैं लोटते-लोटते बिस्तर से नीचे सरकती गई। मेरे पैर फर्श पर थे, पीठ बिस्तर पर, हाफ पैंट घुटनों पर और घुटने न बिस्तर पर थे न फर्श पर । मेरे गले में नाल शरीफ का तावीज था । चाचा ने अपनी लुंगी ऊपर उठाई । मैंने देखा चाचा के पेड़ू के निचले हिस्से में एक बहुत बड़ा सांप मेरी ओर फन उठाए हुए था, मुझ पर हमला करने के लिए तैयार ।
मै भय से और सिमट गई । मुझे और ज्यादा डराते हुए मेरी दो जांघों के बीच में वह सांप बार-बार फन मारने लगा । एक बार, दो बार, तीन बार । डर के मारे मेरे हाथ-पैर जैसे सुन्न हो गए । मेरी फटी-फटी आंखों की ओर देखकर चाचाजी बोले, ''लॉजेंस खाओगी ? तुम्हारे लिए कल लॉजेंस खरीद लाऊंगा । यह लो माचिस। और गुड्डी इस बात का जिक्र तुम किसी से न करना कि तुमने मेरी नूनी देखी है और मैंने तुम्हारी 'चिज्जी' देखी है। ये सब गंदी चीजें हैं, किसी को बताने की नहीं । ''
मैं दियासलाई लेकर कमरे से बाहर निकल आई । मेरी जांघों के बीच में दर्द हो रहा था। मुझे पेशाब लगी थी। फिर मैंने पाया कि हाफपैंट में मेरा पेशाब निकल गया था। मैं इस नंगे होनेवाले खेल का नाम नहीं जानती थी । मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि शराफ मामला और अमान चाचा का मुझ पर इस तरह चढ़ने का आखिर क्या कारण था ? चाचाजी ने कहा कि यह बात किसी को बताने की नहीं है। मुझे भी लगता था कि यह बात किसी से कहने की नहीं है। साल साल की उम्र में अचानक मुझमें यह चेतना आ गई कि यह सब बड़े शर्म की चीज है, इन बातों का जिक्र कभी किसी से करना ठीक नहीं। ये सब बड़ी गोपनीय बाते हैं।
मैं आज भी सोचती हूं कि इन दोनों घटनाओं का जिक्र मैंने अपने घरवालों से क्यों नहीं किया ? अपने मामा और चाचा को लोग बुरा कहें, शायद मै नहीं चाहती थी । जीवन में इनके सम्मान की रक्षा करने का दायित्व क्या किसी ने मुझे दिया था ? चूंकि वे दोनों मेरे चाचा और मामा थे तथा बचपन में अपनी किताब में मैंने पढ़ा था कि बड़ों का हमेशा सम्मान करना चाहिए। क्या इसीलिए मैं मौन रही थी? उन्हें मैं अच्छा आदमी समझती थी क्या इसलिए मैं यह चाहती थी कि मेरी यह धारणा गलत न हो? जैसे कि जो कुछ घट गया वह कोई सच्ची घटना नहीं थी, एकदम मिथ्या थी।
दरअसल वह मेरा दु:स्वप्न था। या fफर मामा या चाचा के रूप में वे कोई और थे, मेरे पूर्वजन्म के शत्रु थे। किसने मेरी बोलती बंद कर रखी थी, सारी यंत्रणा मन ही मन भुगतते रहने के लिए किसने कहा था? घर के सभी लोग मेरी शिकायत को तुच्छ समझते हुए कहते कि मुझे भूत या जिन्न ने पकड लिया है, या मै पागल हो गई हूं या फिर झूठी हूं, या मै कम उम्र में ही शैतान हो गई हूं। मुझे कोई गोद में लेकर प्यार नहीं करेगा बल्कि थप्पड़ ही मारेगा, क्या इस डर या दुविधा से मैं खामोश रही थी? या फिर कोई मुझे अपना ऐसा नहीं लगता था जिससे दिल खोलकर अपना दर्द कह सकती, अपने घाव दिखा सकती। मां भी मुझे इतनी अपनी नहीं लगती थी।
जिस मां के आंचल की छांह में मेरी दुनिया थी, जो मां ऐसे वृक्ष की तरह थी जिसकी छाया में मैं थके मन को आराम देती थी, जो मां स्वच्छ जल का तालाब थीं, जिसका पानी पीकर मैं जीवित थीं, अगर ऐसी मां भी अपनी न लगे तो फिर और कौन लगता । मेरे भीतर उस वक्त दो व्यक्ति सत्ताएं थीं- एक मैं अपने साथियों के साथ अपेंटो, बायस्कोप, गोल्लाछूट, गुलाबपद्म खेलती, दूसरी मैं, उदास होकर अकेली तालाब के किनारे, रेल लाइन के किनारे, घर की सीढि़यों पर बैठी रहती । हजारों लोगों की भीड़ में मैं अकेली थी । इस अकेली लड़की के साथ सबकी मीलों दूरी पैदा हो गई थी। यह लड़की हाथ बढ़ाकर इतनी लंबी दूरी पार करने किसी को छू नहीं पाती थी, यहां तक कि अपनी मां को भी नहीं। हाथ बढ़ाने पर खालीपन के अलावा और कुछ हाथ नहीं आता था ।
तसलीमा नसरीन
(आत्मकथा: खंड-एक: मेरे बचपन के दिन)
नोट- जिस वक्त की यह घटना है उस वक्त तसलीमा महज 7 वर्ष की थीं।
Comments
Nari ki vidambna...
Abla jivan haay tumhari yahi kahani.....Aachal me hai doodh aur aakhon me pani.....
saayad tasleema ke itne kare
saayad tasleema ke itne kare aur sakhta novel likhane ka yahi sab kaaran raha ho????????? jo v ho aapne aa6i mehanat ki hai...
good series
good series of tasleema. kya hum isme aur bhi hindi author ko pad payenge to accha hoga...meeta, noida
हां क्यों नहीं
तसलीमा की जीवनी पांच खंडो में है । इसके मुख्य-मुख्य अंश को प्रकाशित करने के बाद दूसरे रचनाकारों की जीवनी भी प्रकाशित की जाएगी । वैसे आम पाठक जिस भी व्यक्ति की जीवनी पढ़ना चाहेंगे और उसके बारे में लिखेंगे तो उसे प्राथकिमता के आधार पर प्रकाशित किया जाएगा- श्वेता देव
kam mein acchi jankari
waqt ki kami se bahut padne ka mauka nahi milta hai.. accha hai aapki is tarah ki kadi mein thode mein sab padne ko mil jaega..tasleema ke sath hi dusare authors ke baare mein bhi jaldi likhiyega.... facebook