अंशुमन तिवारी। सरकार ठीक कहती है, दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर मुंबई के आजाद मैदान तक हवा में लहराती हजारों मुट्ठियां संसद पर ही सवाल उठा रही हैं। जनता के सवाल लोकतंत्र में महाप्रतापी संसद की गरिमा और सर्वोच्चता पर हैं नहीं, लोग तो संसद की स्थिति, उपयोगिता, योगदान, नेतृत्व, दूरदर्शिता, सक्रियता और मूल्यांकन पर प्रश्नचिन्ह लगा
अंशुमान तिवारी, नई दिल्ली। अन्ना के आंदोलन में विदेशी हाथ का अजीबोगरीब कांग्रेसी आरोप तो पुष्ट नहीं हुआ, लेकिन महंगाई पर जनता के गुस्से का हाथ इस आंदोलन में जरूर है। 64 साल में अधिकांश अहम राजनीतिक करवटों की बुनियाद जनता को निचोड़ने वाली महंगाई ने ही तैयार की है। 1967 में कांग्रेस
अंशुमान तिवारी, नई दिल्ली। अन्ना आज कुछ सुस्त हैं। अनशन का आठवां दिन है। भारत माता की जय के नारे लगते हैं तो लेटे लेटे दाहिना हाथ उठ जाता है। गर्दन घुमाकर पीछे गांधी के चित्र पर नजर और फिर एक निगाह सामने जनता पर। मानो प्रेरणा व प्रभाव को जोड़ रहे हों।
अमेरिका ने फ्रांस को कुछ समझाया। फ्रांस ने स्पेन व इटली को हमराज बनाया। जापान और कोरिया भी आ जुटे। गोपनीय बैठकें, मजबूत पेशबंदी और फिर ताबडतोड़ कार्रवाई।.. पेट्रोल के सुल्तातन यानी तेल उत्पाटदक मुल्कं (ओपेक) जब तक कुछ समझ पाते तब तक दुनिया के तेल बाजार में एक्श न हो चुका था।