मेलबर्न। एक ताजा अध्ययन में पाया गया है कि बेटे के व्यक्तित्व विकास के लिए पिता का साथ बेहद जरूरी है। खासकर किशोरावस्था में जब बच्चे गलत दिशा की ओर जल्दी मुड़ जाते हैं।
अगर ऐसे मौके पर पिता की छत्रछाया बनी रहती है तो बच्चे के जीवन में भटकाव नहीं आता है। लड़कियों पर हालांकि पिता के होने या नहीं होने का असर नहीं देखा गया है।
महानगरों में भले ही लिव इन रिलेशनशिप, लव, अफेयर, लव मैरिज का चलन देखने को मिल रहा हो, लेकिन परंपरागत भारतीय समाज में अभी भी जीवनसाथी के चयन में मां ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। दुनिया की सबसे बड़ी मैरिज पोर्टल शादी डॉट कॉम के मुताबिक मदर्स डे पर कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि मां ही बच्चों के हमसफर को चुनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभ
एक समय वह था कि जब युवा वर्ग के लोग अपने विवाह या प्रेम को अधिक महत्व देते थे, लेकिन आज की युवा पीढ़ी इनके स्थान पर अपने करिअर को अधिक महत्व देने लगी है। इन युवाओं का कहना है कि वर्तमान समय प्रतियोगिता का समय है और इसमें वही युवा सफल हो सकता है जो अपनी समस्त शक्ति एवं क्षमता को एकत्रित कर अपने करिअर में लगा दे। आज के युवक-युवतियां बहुत
अमेरिका और ब्रिटेन में पारंपरिक पारिवारिक ढांचा लगातार बिखर रहा है। अमेरिका में साल 1964 तक जहां 93 फीसदी बच्चे शादीशुदा अभिभावकों की संतान थे, वहीं 2009 आते-आते शादीशुदा मां-बाप के बच्चों की तादाद घटकर 58 फीसदी पर आ गई। यानी 42 फीसदी बच्चे बिना शादी के साथ रह रहे स्त्री पुरुष की संतान थे। ब्रिटेन में तो 2009 में जन्म लेने वाले 46 प्रतिशत बच्चे गैर शादीशुदा
साकेत में रहनेवाली हिमानी शुक्ला वर्षों से इस इलाके में रह रही हैं लेकिन उन्हें इतना पता नहीं है कि उनके पड़ोस में कौन रहता है। उनके नाम तक नहीं मालूम है, वे लोग क्या करते हैं और कहां के हैं ये तो दूर की बात है । सुबह पति के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद हिमानी पूरे दिन अकेली रहती है । अक्सर उन्हें ये अकेलापन खलता भी है लेकिन वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती है
मेरे साथ मेरे मम्मी-पापा बहुत खुलकर बातें करते हैं और बचपन से ही वे बहुत ज्यादा फ्रेण्डली रहे हैं । मेरे घर का माहौल बहुत अच्छा है और घर में किसी बात को लेकर कभी कोई रोक-टोक नहीं रही है और ना ही मेरे या मेरे भाई के ऊपर कभी माता-पिता का किसी तरह का दबाव रहा है । ये कहना है आरकेपुरम सेक्टर-3 में रहनेवाली 21 वर्षीय आशिमा का।
नई दिल्ली। पापा जो बचपन में हमारा ख्याल रखते हैं। पापा जो युवावस्था में हमें सही मार्ग दिखाते हैं और दुनिया से बचाते हैं । और वही पापा एक दिन हमारे लिए आंख बचाने की 'वस्तु' हो जाते हैं। वस्तु, जी हां 'वस्तु' क्योंकि किसी वस्तु का ही हम उपयोग करते हैं। जिनसे हमें प्यार होता है, उनके लिए हमारे दिल में सम्मान और समर्पण की भावना होती है, लेकिन आधुनिकता की होड़ म
भारत में तेजी से एकल परिवार की अवधरणा बढ़ती जा रही है खासकर बड़े शहरों और मेट्रों शहरों। अब तो इसकी आग छोटे शहर और गांवों में भी पफैलाती जा रही है। जहां देखो वहीं एक परिवार अपना पांव पसारते जा रही है। इसकी वजह चाहे बढ़त पारिवारिक दायित्व से बचना हो या पिफर पश्चिम देशी की नकल में आध्ुनिकता की दिखावा। यह हमारे देश और संस्कृति के खिलापफ है। जो मां-बाप बड़े जतन से बाल-बच
सविता की बेटी अब बड़ी हो रही है । पहले स्कूल जाती थी तो सरिता को होमवर्क पूरा कराने की चिन्ता सताती थी अब बड़ी हो रही है तो दस तरह की बातें सरिता के दिमाग में घूमने लगी हैं । मां की चिन्ता तो खैर कभी खत्म ही नहीं होती लेकिन अगर आपकी बेटी किशोर अवस्था में कदम रख रही है तो लाजमी है कि आप भी अपनी बेटी को लेकर सर्तक हो जाती हैं । उसे घर समय से आने के लिए कह
मेरी मां बहुत अच्छी है। वह बहुत खूबसूरत है। वह मुझे कभी नहीं मारती। वह मुझे हर मांग को पूरा करती है। मेरे खाने का वह विशेष ध्यान रखती है। हमेशा मेरा मनपसंद खाना बनाती है। वह मेरे साथ कैरम, इंटरनेशनल बिजनस और लूडो खेलती है। अगर मैं दुखी हो जाऊं तो वह मुझे मनाती है। वह मुझे दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करती है। मैं भी अपनी मां को सबसे अधिक प्&zw