नईम के साथ लेटने-सोने की शुरुआत में ही वह घटना या दुर्घटना घट गई। रुद्र केसाथ अर्से तक सोती रही थी, मगर ऐसी घटना नहीं घटी थी। लेकिन नईम के साथ सोते हुए, कुल दो दिनों में ही वह घटना घटी, मुझे गर्भ ठहर गया। मैंने अपने समूचे तन-बदन में विस्मयकारी परिवर्तन महसूस किया। मन में भी कई तब्दीलियों का अहसास हुआ। मानो मैं कोई और ही मैं हूं। इस 'मैं' को मैं नहीं पहच
मैं अपना टूटा दिल लिए, नईम के पास पहुंची। हीनता, स्वार्थपरता, कुटिलता नईम में बिल्कुल नहीं है। वह तो बस वही-वही करता और कहता है जिससे मैं खुश हो जाऊं। वह ऐसा क्या करे कि मैं उसे अक्लमंद मानूं, ऐसा कौन सा काम करे कि मुझे लगे, उसके मन में संकीर्णता नहीं है, वह ऐसा क्या कहे कि मैं समझ जाऊं कि वह औरत-मर्द में किसी भी किस्म की विषमता का व
कहानी-उपन्यास लिखकर जनप्रिय बना, मिलन(इमदादुल हक मिलन), आखों में प्यार-प्यार के भाव भरे हुए, मेरी तरफ देखता रहा। मिलन से मेरा परिचय आज का नहीं है। 'संझाबाती' के प्रकाशन के जमाने से ही, हमारे पत्राचार का सिलसिला कायम था। वह बेहद खूबसूरत रुमानी खत लिखा करता था। प्रेम के पानी में डूबा हुआ, कांपता-सिहरता एक-एक शब्द। मिलन सिर्फ मुझे ही नहीं, हर लड़
धर्म ने इस धरती पर अधंरे के अलावा कुछ नहीं फैलाया। दरअसल इंसान की अज्ञानता और मृत्यु भय से ही धर्म ने जन्म लिया। एकेश्वरवादी मर्दों ने अपने आनन्द के लिए ही धर्म रचा। इहलौकिक सुखभोग के लिए!
रात को मेहमानों के लिए जब सोने का इन्तजाम किया जा रहा था। मेरे और रूद्र के लिए दो अलग-अलग कमरों का इन्तजाम किया गया।, क्योंकि मेहमानों में से ही किसी ने घर के कर्ता के कान में, हमारे विवाह विच्छेद की बात फूंक दी थी। रूद्र और मैने, दोनों ने ही अलग-अलग कमरे में रहने का प्रस्ताव सविनय खारिज कर दिया और हम एक बिस्तर में स
रूद्र (तसलीमा का पति) जब खाना लेकर लौटा , मैंने उससे दरयाफत किया ,''यह महिला कौन है,जिसे तुमने अपनी जिन्दगी ही समर्पित कर डाली है ?
''हां,कभी अर्पित की थी ।'
'कौन है वह औरत ?'
'यह जानना क्या बहोत जरूरी है ?'
'बता दो । मैं भी सुन रखूं ।'
'नेली ।'
'तो ये कविताएं लालबाग में बैठकर लिखी गई हैं ?'
ईद की सुबह स्नानघर में घर के सभी लोगो ने बारी-बारी से कोस्को साबुन लगाकर ठण्डे पानी से गुस्ल किया । मुझे नए कपड़े -जूते पहनाए गए, लाल रिबन से बाल से बाल संवारे गए, मेरे बदन पर इत्र लगाकर कान में इत्र का फाहा ठूंस दिया गया । घर के लड़कों ने कुर्ता-पाजामा पहनकर सिर पर टोपी लगाई
उस रात भी घर लौटकर, रूद्र मेरी मिन्नतें करता रहा, सुनो रानी बहू थोड़ी सहज हो जाओ । अपने को इतना सख्त मत रखो। अपनी देह को जरा नरम करो। रूद्र उस रात भी प्रशस्त किए ग
अचानक वीथि पानी के प्रसंग से हटकर, बिल्कुल नया सवाल कर बैठी, `अच्छा भाभी तुम अपने गहने वगैरह कुछ क्यों नहीं लाईं? घर की बहू हो, आखिर लोग क्या कहेंगे? कल शाम सीमू के जन्मदिन पर, लोग-बाग आएंगे! चलो, ठीक है, मै ही कुछ एक गहने दे जाऊंगी। तुम वही पहन लेना।'
उस बार, रूद्र जब ढाका लौट गया, उसके करीब सात दिनों बाद मै क्लास दाखिल हो रही थी, ऊपर की क्लास की एक लड़की ने मुझे सूचना दी कि नीता लाहिरी ने सन्देश भेजा है कि मै इसी वक्त उससे घर पर मिलूं। क्लास छोड़कर मै गुन के घर भागी। वहां जाकर देखा, गुन के बैठक कमरे में रूद्र बैठा हुआ था। कमरे के काठ की दो अदद कुर