कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए,
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है,
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए।
न हो कमीज तो पांवों से पेट ढंक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब है, इस सफर के लिए।
जब मैं छोटा था, शायद दुनिया
बहुत बड़ी हुआ करती थी..
मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक
का वो रास्ता, क्या क्या नहीं था वहां,
चाट के ठेले, जलेबी की दुकान,
बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां "मोबाइल शॉप",
"विडियो पार्लर" हैं,
फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है...
मेरी जिन्दगी तो बस इसी पलंग के नीचे ही खप लेगी, विकास अपने कपड़े झाड़ते-पोछते चिल्लाया। बस हो गए परेशान, मैं दिनभर न जाने कितनी बार इस पलंग के नीचे घुसती हूं, चोट खाती हूं। तुम्हें एक बार क्या जाना पड़ा कि बस उठा लिया पूरे घर को अपने सिर पर। मीनाक्षी ने विकास को झड़पा। विकास बोला तुमने पलंग पर जो ये सिरहाना लगवाया है न, सारी फसाद की जड़ ही यही है। यह अगर न होता तो हमे
राह देखता तेरी बेटी, जल्दी से तू आना
किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू मुस्काना
ना चाहूँ मैं धन और वैभव, बस चाहूँ मैं तुझको
तू ही लक्ष्मी, तू ही शारदा, मिल जाएगी मुझको
सारी दुनिया है एक गुलशन, तू इसको महकाना
किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू मुस्काना
बन कर रहना तू गुड़िया सी, थोड़ा सा इठलाना
दिल्ली स्थित आक्सफॉर्ड बुकस्टोर तथा बुक्स टॉक ऑडियो-बुक्स ने सामुहिक रूप से रविन्द्र सिंह की चर्चित उपन्यास 'i too had a love story' की ओडियो बुक लांच की। पेशे से एक साफ़्टवेयर इंजीनियर रविन्द्रर सिंह का ये पहला उपन्यास है जो उनके वास्तविक जीवन पर आधारित है।
वात्स्यायन के बताए पुराने कामसूत्र को मौजूदा दौर में कैसे इस्तेमाल किया जाए? नई जीवनशैली को अपना चुके लोग इससे कैसे फायदा उठा सकते हैं? यही बताती है एएनडी हकसर की नई किताब, 'ए आधुनिक कामसूत्र'.
हर रात मेरे बिस्तर पर आकर लेट जाता है, एक नपुंसक मर्द !
आंखें
अधर
चिबुक
पागलों की तरह चूमते-चूमते,
अपनी दोनों मुट्ठियों में भर लेता है-स्तन!
मुंह में भरकर चूसता रहता है ।
मारे प्सास के जाग उठता है, मेरा रोम-रोम
मांगते हुए सागर भर पानी, छटपटाता रहता है ।
शब्दों का अस्तित्व यही, पल भर में व्यर्थ वो हो जाते हैं |
किंतु मौन की भाषा को सब युगों युगों तक दोहराते हैं ||
पल भर को एक कथा सुनाकर शब्द राह अपनी चल देते |
किंतु मौन में जड़े शब्द निज छाप अमित ताज कर हैं जाते ||
शब्दों से कोलाहल बढ़ता, नित नवीन कोई घटना घटती |
और विचित्र कोई अर्थ बताकर इतिहासों में गुम हो रहती ||
शेखर वर्मा अपनी वर्तमान स्थिति से इस अर्थ में सन्तुष्ट है कि नौकरी अच्छी है। एक बच्चा है। बीवी भी घर पर ट्यूशन पढ़ाती है। लेकिन नौकरी की व्यस्तता और शाम बच्चों को न दे पाने की कसक उसके मन में जरूर रहती। मात्र तीसरी में पढ़ने वाला उसका बच्चा रुद्र कई बार सवाल कर बैठता, पापा हमारे साथ घूमने-फिरने के लिए आपके पास कभी वक्त नहीं होता है। इतनी नन्ही सी जान और ऐसे बोल ले
पुरूष : तुम एक व्यक्ति नहीं शक्ति हो नारी
पहचानों खुद की ताकत को
एक इकाई न हो तुम
वरन तुम से बना है ये इमारत
महिला : सब मालूम है पर हूँ लाचार
मैनें पायी है मातृत्व का भार
जो कर देता है नस-नस में
सिर्फ दया, करूणा और त्याग